एक बूंद जो आंख से छलक जा गिरी

एक बूंद
जो आंख से छलक
जा गिरी
पानी की एक धारा में,
और कमबख्त

नीर का रंग बदल गया।
कुछ ऐसे ही
बदली है
कहानी जिंदगी की,
और बस यूंही
हमारे जिंदगी जीने का ढंग बदल गया।।
दुनिया का दस्तूर है
साथ छोड़ जाना
अजी यहां तो लोग
वस्त्रों-से
अपनी पसंद को
उतार फेंक देते है,
इनकी क्या बात
करें साहेब
ये तो
मरे की चिता पर भी
रोटी सेंक लेते है।
नीर रंग भांति
हृदय ये सारी उमंग बदल गया,
कुछ ऐसे ही........
बदलाव लाज़मी है
सब कुछ बदलता है
कभी जग को
तो कभी
खुदा को बदलते देखा है,
अजी गहरा है
और गहराई है
किसी के पीछे
किसी की रुसवाई है
कर्म करता है 'विजय'
तो बस
पर लोगों से सुना
किस्मत बदलती हस्त-रेखा है।
आघात हुआ तब
जब अपनों का तरीका रिश्तों संग बदल गया,
और कमबख्त
पानी भी अपना ढंग बदल गया।।

©®विजय खनगवाल


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