चप्पा-चप्पा है गुफ्तगू में,
आखिर कब निकलेगा भोर का तारा।
द्वार-द्वार ये बात चली है,
आहट से खुशरंग में है आलम सारा।।
आखिर कब निकलेगा भोर का तारा।
द्वार-द्वार ये बात चली है,
आहट से खुशरंग में है आलम सारा।।
भांत-भांत के फूल खिले है,
भांत-भांत की कोमल कलियाँ।
भिन्न-भिन्न भँवरे मंडराते,
भिन्न-भिन्न खुशबू से महकी गलियाँ।
स्वर संगीत के सात सुनाती,
कल-कल बहते ये झरनें, ये धारा
चप्पा-चप्पा है........
गरज-गरज बादल बरसे,
लहर-लहर में रोष है।
स्पर्श तेरा पाने को आतुर,
पात-पात में जोश है।
आखिर कब उजागर होगा,
आशा रंग में रंगा उजियारा
द्वार-द्वार ये बात.........
©®विजय खनगवाल

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