18 साल के इस सफर में,
कुछ खट्टे-मीठे अहसास कमाए है।
18 साल के इस इतिहास में,
कुछ इतिहास बने कुछ दिल में बनके खास समाए है।।

संग सब अपने हो तो महक उठता हूँ,
सीखा दूसरों को महकाना भी।
फल लदे पेड़ से गर झुकना सीखा,
तो सीखा ईमान से सिर उठाना भी।
बोल लेता हूँ हंसकर सबसे,
जात-धर्म ना बुद्धि पर कभी छाए है......

नयी सोच, नयी उमंग, नई काल्पनिक शक्ति,
तो कभी सकारात्मकता का परिचायक हूँ।
अपना-अपना नजरिया है देखने का,
किसी की नजर में बुरा तो कहीं नायक हूँ।
हंसते है पीठ पीछे जो अपने,
उनपर भी ना तीखे बाण चलाये है.....

वक्त बदला है अब मैं भी बदलता हूँ,
थोड़ा समझने का नजरिया, तो कुछ मिजाज बदलता हूँ।
बनकर दोस्त ठगने वालों,
दोस्ती जताने का अब अंदाज़ बदलता हूँ।
लफ्ज चुभेंगे 'विजय' तेरे अब,
जो लोगों ने पीठ पर ख़ंजर चलाये है......
             ©®विजय खनगवाल

Comments