कभी गैरों की यारी,
तो कभी यारों की शोहबत पर लिखता हूं।
मैं हर रोज उकेरता हूँ अफ़साने,
कभी बेवफाई तो कभी मोहब्बत पर लिखता हूँ।
                                  ©® विजय खनगवाल

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