खिल उठता हूँ- एक गजल By विजय खनगवाल

खिल उठता हूँ, मैं रोज जब तेरी तस्वीर देखता हूँ।
अपने हर खाब में, मैं तुझे ही अपनी हीर देखता हूँ।।

ना जाने कब दूर होंगी दूरियां ये,
मैं 'मैं' से 'हम' के संगम की लकीर देखता हूँ।

मांगता हूँ फ़क़ीर बनकर सबसे तुझे ही,
पूरी करे जो ये तमन्ना वो नसीर देखता हूँ।

मुमकिन नहीं धड़कन का चलना बिन तेरे,
दिल्लगी में तुझसे अब खुद को अधीर देखता हूँ।

कि मिला नहीं जवाब तेरा मेरे खत के जवाब में,
अनजाने हुई जो कोई मुझसे तकसीर देखता हूँ।

'विजय' की 'ज्योति' बनकर आये जो,
तेरा पैगाम समेटे आये कोई वो समीर देखता हूँ।
              
               ~विजय  खनगवाल

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